<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>मैग्निफिसेंट न्यूज़</title>
	<atom:link href="http://magnificentnews.co.in/?feed=rss2" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://magnificentnews.co.in</link>
	<description></description>
	<lastBuildDate>Mon, 19 Mar 2012 12:01:18 +0000</lastBuildDate>
	<language>en</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
	<generator>http://wordpress.org/?v=3.3.1</generator>
		<item>
		<title>कविवर ‘नेपाली’ की पुण्य तिथि ( 17अप्रैल) पर विशेष</title>
		<link>http://magnificentnews.co.in/?p=8</link>
		<comments>http://magnificentnews.co.in/?p=8#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 14 Mar 2012 09:19:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ravi Kumar Sinha</dc:creator>
				<category><![CDATA[संस्मरण]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://magnificentnews.co.in/?p=8</guid>
		<description><![CDATA[
17 अपैल 1963 का दिन और बिहार भागलपुर के रेलवे प्लेटफार्म न02 पर पड़ा कविवर नेपाली का निस्तेज पड़ा शरीर कोई कैसे भुल सकता है । इसी दिन क्रुर काल ने जन-जन के प्रिय कवि नेपाली को हमसे छीन लिया । अचानक यूं कुछ ऐसा अप्रत्याशित होगा किसी ने भी कल्पना भी नहीं होगी । सभी स्तब्ध मर्माहत, असक्त चुपचाप भगवान के लिए इस दुख को सम्भालने में लगे थे । एक दुसरे को सम्भालते, समझाते हुए । आग की तरह फैलती इस खबर, ने बी∙बी∙सी∙के द्वारा घर में प्रवेश किया तो पुरा परिवार भोजन के लिए बैठा था । हमारे यहां प्राय: रेडियो बजता ही रहता था । किसी को न्यूज और किसी को गाने अच्छे लगते थे । प्रख्यात कवि नेपाली की बिहार के भागलपुर में अचानक ह्रदय गति रुकने से निधन हो गया है । भारत ने एक प्रख्यात कवि नहीं । अपने ‘वन मैन अभी’’ को ...]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://magnificentnews.co.in/wp-content/uploads/2012/03/gsn.jpg"><img src="http://magnificentnews.co.in/wp-content/uploads/2012/03/gsn.jpg" alt="" title="gsn" width="160" height="200" class="alignleft size-full wp-image-9" /></a></p>
<p>17 अपैल 1963 का दिन और बिहार भागलपुर के रेलवे प्लेटफार्म न02 पर पड़ा कविवर नेपाली का निस्तेज पड़ा शरीर कोई कैसे भुल सकता है । इसी दिन क्रुर काल ने जन-जन के प्रिय कवि नेपाली को हमसे छीन लिया । अचानक यूं कुछ ऐसा अप्रत्याशित होगा किसी ने भी कल्पना भी नहीं होगी । सभी स्तब्ध मर्माहत, असक्त चुपचाप भगवान के लिए इस दुख को सम्भालने में लगे थे । एक दुसरे को सम्भालते, समझाते हुए । आग की तरह फैलती इस खबर, ने बी∙बी∙सी∙के द्वारा घर में प्रवेश किया तो पुरा परिवार भोजन के लिए बैठा था । हमारे यहां प्राय: रेडियो बजता ही रहता था । किसी को न्यूज और किसी को गाने अच्छे लगते थे । प्रख्यात कवि नेपाली की बिहार के भागलपुर में अचानक ह्रदय गति रुकने से निधन हो गया है । भारत ने एक प्रख्यात कवि नहीं । अपने ‘वन मैन अभी’’ को खो दिया है जिसकी कविताओं ने भारतीयों के ह्रदय में देश प्रेम की प्रबल भावना भरी और देश दुश्मनों को अपनी कविता की धार से विछिन्न कर दिया था । इस खबर ने घरवालों पर क्या प्रभाव डाला होगा उस भाव को शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है । मां घबड़ाते हुए थालीं से उठकर खड़ी हो गई । उन्हें देखकर सभी असमंजस की स्थिति में धीरे-धीरे हाथ धोने लगे । मामा जी (बालकृष्ण सिंह) ने  मुंह के कौर को उगला और चुपचाप बैठ गये । खबर थी जो कानो में गुंज रही थी किन्तु मन मानने को तैयार नहीं था । अविस्वसनीय स्थिति बनी हुई थी । बच्चे सहमे हुए बड़े चुप तभी छोटे चाचा जी भागते हुए आये उन्होने खबर की पुष्टी करते हुए बताया कि वो दुकान में चाय पी रहे थे तो विविध भारती से यह दु:खद समाचार उन्होनें सुना । चुंकि फिल्मी गानों को रोककर उदघोषक ने यह छाती फटने की खबर सुनाई चारों ओर खलबली, मुहल्ले वालों की आती भीड़ हर चौक-चौराहे की चर्चित इस खबर ने इस विवादास्पद समाचार की पुष्टि कर दी – कौन किसे सन्तावना दे कुछ समझ में नहीं आ रहा था । आधा परिवार मुम्बई, आधा परिवार बेतिया में , अनुज मगन ज़ी गोरखपुर में, उस समय न तो आवागमन की इतनी सुविधायें थी न मोबाईल का जमाना था । समस्त भारत में एक चुप्पी छा गई । अगर कहीं चर्चा थी तो एक निर्भीक कलम के सिपाही की मौत की जिसने कभी अपने आर्दश को नहीं छोड़ा और ना ही नैतिकता के मापदंड के साथ कोई समझौता ही किया । दुखों को समेट जब व्यवहारीकता की बात आई तो पुन: एक संकट और सामने आया कि मुम्बई से बहुत कम ट्रेन बिहार के थी । चार पांच दिनों का सफर तय कर पटना फिर एक दिन भागलपुर जाने में लगता । घर में छोटे-छोटे बच्चे उस पर पिता के देहान्त कि सूचना पाकर मोहन भैया अपना सन्तुलन सम्भाल नहीं पा रहे थे । कुल विपरित परिस्थितियों को देख कर आदरणीय माता जी (स्व∙वीणा रानी नेपाली) ने अपने नहीं आने की सूचना भागलपुर तक पहूंचाई और समर्थता के अभाव में वहीं ‘दाह- संस्कार कर देने का आग्रह किया। अनुज मगन जी, सुरज जी, गोरखपुर, हरिनगर से एकत्र होकर भागलपुर कि ओर चले ईधर बेतिया में स्व विमल राजस्थानी ने सबसे छोटे अनुज शेर बहादुर को भी स्थानीय कवियों की सलाह और सहयोग से भागलपुर के लिए रवाना कर दिया किन्तु जब तक अनुज वहां पहूचते शव- यात्रा नेपालीजी अमर रहें की जयघोष के साथ प्रारम्भ हो चुकी थी। परितता की आंधी जब आती है तो उसके उड़ते धूलकण में कुछ दिखाई नहीं देता । सब अस्त-व्यस्त हो जाता है वैसा ही कुछ उस समय भी हुआ । हाहाकार मचे हुए माहौल में इतनी विवादित बातें थी कि कुछ भी स्पष्ट नहीं हो पा रहा था, किन्तु एक और संस्मरण मेरे घर में बार-बार दुहराया जाता रहा वो ये कि ‘नेपालीजी’ जन-जन के बीच कितने लोकप्रिय थे, बुढे, बच्चे, जवान, स्त्री सभी उन्हे अन्तिम विदा देने को अश्रुपुरित नेत्रों से आकुल व्याकुल हो उनके पीछे-पीछे चले जा रहे थे । धन्य है भागलपुर की धरती, गंगा का बरारीघाट और भागलपुर वासी जिनके प्रिय कवि नेपाली ने अपनी चिरनिद्रा हेतु इनका ही चयन किया । कहते है ताली दोनों हाथों से बजती है सो स्पष्ट है । जब तक धरती रहेगी तब तक भागलपुर की धरती गर्व से नेपाली के महाप्रयाण की गाथा गुंजती रहेगी ।<br />
      और आग, राग, प्रकृति, सौन्दर्य भक्ति, प्रेम और राष्ट्रीय गीतों के अमर गायक ‘गीतों के राजकुमार’ कविवर नेपाली का पार्थिक का पचभुतों में समाहित हो गया किन्तु उनके लिखे गीत आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं ) गोपाल सिंह ‘नेपाली केवल आद्वितिय कवि नहीं थे बल्कि एक तेजस्वी विचार के अनुठे मानव भी थे जिनके ह्रदय में परिवार के लिए देश के लिए समाज के लिए मित्रों के लिए शिष्यों के लिए यू कहें कि पृथ्वी की कण- कण के लिए अपार- अपार श्रृद्धा और प्रेम ऐसा अमृत-सागर था जो कभी न सुखता था और अगर किसी ने भूले से उस सागर में छलांग लगा ली तो अमृत के साथ-साथ मोती भी मिल जाती। मैंने नेपाली-सहित्य को समेटने और समझने के प्रयास में जो घुमन्तु-भोटिये’ की यात्रा की इस यात्रा में अपना परिचय न देने पर भी एक ऐसा व्यक्ति न मिला जिसने कवि नेपाली के व्यक्तित्व और उदारता का वर्णन प्रसन्न होकर न किया हो । नए लोग नई प्रतिभा, नये परिचय को वो ऐसे बदकर सहयोग देते कि सामने वाला उनका मुरीद हो जाता । उन्हें किसी से प्रतिस्पर्धा न थी । केवल अपने प्रतिभा के आलोक में उन्होनें हिन्दी साहित्य का क्षेत्र हो या फिल्मी मायानगरी, गध हो या पध हर जगह अपनी ऐतिहासिक पहचान बनाई । उनकी स्पष्ट धारणा थी कि काल के प्रवाह में जो कविता स्थिर रह जायेगी वही कविता सच्ची कही जायेगी और उसका कवि अक्षर और अमर हो जाएगा’’<br />
     मैं गायक स्वछ्न्द हिमालय का &#8212;- की उदघोषणा से अपना परिचय देने वाले नेपाली की ‘राष्ट्रभक्ति’ उनकी धमनियों में रक्त बनकर दौड़ता रहता था ।<br />
        जपान देश जापानी का, इरानी का इरान है<br />
यह मेरा हिन्दुस्तान है …<br />
             हिन्दुस्तान के किसी छोर पर अगर देश के दुश्मनों के डोलने की खबर पाकर ही नेपालीजी बेचैन हो जाते और उनकी कलम से शब्दों की गोलियां बरसनी शुरु हो जाती &#8212;&#8211; कोई पूछे पाकिस्तानी से, वह क्यूं है दूर रवानी से पूछो कि उसको क्या लेना, औरों के दाना पानी से ।<br />
         या इन चीनी लुटेरों को हिमालय से निकालो के उदघोष के साथ शेर की तरह जब नेपाली मंच से दहाड़ते तो कोटि कोटि युवाओं की बांहे फड़कने लगती । भारतीयों में राष्ट्रीय संचेतना का भाव भरते हुए उन्हें प्रकृति के उन पंक्षियों का भी उतना ही ख्याल रहता इन पक्तियों में उनकी आन्तरिक प्रसन्नता देखे ‘आजाद परिन्दों से कह दो, अब यहां विदेशी राज नहीं है ताज हिमालय के सिर पर , अब और किसी के ताज नहीं ‘<br />
        कवि नेपाली के व्यक्तित्व की कई विशेषताएं थीं जिनमें उनके कात्य –सृजन एक विशेष पक्ष यह था कि वो देश और समाज में पनप रहे विविध समस्याओं को अपने गीतों का विषय बना महौल एक विचारों की क्रान्ति फैलाते रहे । जब मैं उनके काव्य को पढती आश्चर्य होता है कि किसी व्यक्ति की दृष्टि इतनी तीक्ष्ण हो सकती है जो गिद्ध की तरह आकाश में उड़ते हुए धरती पर भी अपनी सामग्री की ओर झपट्टा मारे । स्वयं नेपाली ने भी इस विस्तृतता को परिभाषित करते हुए लिखा है कि-<br />
       बस मेरे पास ह्रदय भर है<br />
       वह भी जग को न्योछावर है<br />
       लिखता हूं तो मेरे आगे<br />
       सारा ब्रह्राण्ड- विषय भर है ।  अत: यूं कहे कि नेपाली ने अपने गीतों के माध्यम देश को एक नई भंगिमा, एक नया अर्थबोध, देश प्रेम की प्रबल भावना, रिश्तों की गरिमा और एक अत्यन्त समर्थ साहित्यक परिवेश दिया है । यही परिचय उनके फिल्मी गीतकार के रुप में भी रही शायद यही कारण है कि उनके गीत आज भी उतने ही जीवन्त और ऐतिहासिक हैं तथा उन सभी गीतों की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।<br />
       ने वे कभी हताश होते ना किसी को निराश होते देख सकते थे । मित्र शुत्र सबको अपना गलहार ही मानते । नेपाली के अनुज ‘मगनजी’ द्वारा एक संस्मरण आगरा मुंगेर की एक पत्रिका में भी छपी है जो इस प्रकार है । अनुज ’मगन’ ने अपने किसी पुस्तक के लिए बहुत मेहनत की थी । और ‘रामनन्द सागर’ के लिए ‘सम्पूर्ण रामायण’ की पूरी सिक्रिप्ट लिखी किन्तु बात कहीं से हाथ से निकल जाने के कारण उन्हें अपनी मेहनत पर ऊंगली उठते देखकर घोर निराशा हाथ लग रही थी वे चुपचाप घण्टो से सागर पोखरा के किनारे सीढीयों पर बैठे थे कि नेपाली जी झुमते हुए आये और प्यार से उनके कंधो पर हाथ रखकर समझाया &#8212; जानते हो मगन जब तुम्हें लगे कि तुमने कोई बड़ा सराहनीय कार्य किया है और इस बात को कोई समझ नहीं रहा है तो खुश होकर हंसो और अपनी पीठ खुद से थपथपाओ और कहो – वाह तुमने तो बहुत बढ़िया कार्य किया है । कुछ दिनों में लोग तुम्हारी महत्ता खुद समझने लगेंगे । मुम्बई प्रवास के समय भी उन्होने कभी भी बिहार वालों या चम्पारण से अपना नाता नहीं तोड़ा सबको पत्रोत्तर भेजते रहे इसके गवाह कई पत्र है जो उन्होंने बेतिया, बगहा भागलपुर, मुंगेर पटना जमालपुर के कई अनुजों को लिखें हैं । क्षेमचन्द्र सुमन उनके प्रिय थे उन्हें कई पत्र  लिखकर उन्होंने दिल कि बातें कही –सूनी है । बड़ी से बड़ी बात  को धुंए में उड़ाना उनके अक्खड़ स्वभाव का एक हिस्सा था । उनके इसी स्वभाव ने चीनी आक्रमण के समय मुम्बई की सफलता और घर-परिवार के सुखों का परिव्याग कर जनता-जर्नादन के बीच कुद पड़े ।<br />
        भारत के प्यारे जागो, सोये सितारे जागो<br />
        बैरी दुआरे आये, तुम सिर उतारो जागो के द्वारा<br />
  भारत माता की प्रभाती गाकर चीनी सरकार की नीदं हराम कर दी और भारतीय कम्युनिटर पार्टी की धज्जियां उड़ा दी । साहित्यकार सुमन के अनुसार &#8212;&#8211;<br />
           ये कुत्ते लुटेरे चीन के हैं<br />
           मुर्गी को दाने डालो तो<br />
          ये आकर बीनते हैं – जैसे नीर्भिक शब्द आक्रमण के कारण ‘’अन्तर्राष्ट्रीय षड्यंत्र का शिकार हो कवि नेपाली राष्ट्र के लिए शहीद हो गए’’<br />
           कम से कम ऐसे शहीद देश रागी कवि को हम न भुलायें । यह उनका बिहार है जहां आंख खुलते ही वो लिखते हैं &#8212;- प्रथम-प्रथम ही चंचु खुली थी , पहूंच गई पंचम में और<br />
          हुआ देश की खातिर जन्म है हमारा<br />
          कि कवि हैं तड़पना कर्म है हमारा<br />
          कि कमजोर पाकर मिटा दे ना कोई<br />
          इसी से जगाना धरम है हमारा &#8212;&#8212;<br />
हम इतनी सहजता है । उनकी अवदानो को ना भूलें, यह उनकी शतवार्षिकी है । उन्हें उनका साहित्यिक अधिकार है । पुण्य स्मृति को शत-शत नमन ।<br />
                और<br />
ऐसे देश भक्त कवि ‘वन मैन आभी’’ की ।  </p>
<p><strong>सविता सिंह नेपाली</strong></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://magnificentnews.co.in/?feed=rss2&#038;p=8</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>मौत का जश्न</title>
		<link>http://magnificentnews.co.in/?p=1</link>
		<comments>http://magnificentnews.co.in/?p=1#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 29 Feb 2012 06:59:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Ravi Kumar Sinha</dc:creator>
				<category><![CDATA[कहानी]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://magnificentnews.co.in/?p=1</guid>
		<description><![CDATA[
बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक रचिता दी एकदम से सामने आ खड़ी हुई, प्रार्थना इनसे मिलो ये भाभी हैं और ये हैं प्रताप भैया । बचपन से नाम सुनती आई थी, बातें कम ही की थीं, क्योंकि अपने बाल्यकाल से ही अल्पभाषी थी ही, दूसरे गांव में मेरा रहना ही कम हुआ था , फिर भी परिचित लोगों को देखकर मैंने शिष्टाचारवश करबद्ध प्रणाम किया तो पति- पत्नी ने आशीर्वादों की जैसे झडी लगा दी । मन सुवचनों को सुनकर तृप्त हो गया तो मैं अतिथ्य सत्कार में जुट गई।
आगन्तुक सम्पन्न घराने से संबद्ध थे सो चाय से लेकर भोजन तक उनके ठसक में कमी न आने दी ! एक विशेष बात यह थी कि उनके साथ उनका प्यारा सुपुत्र त्रिलोकी भी था जिसे मुझसे विशेष रुप से मिलाया गया था क्योंकि उसके शिक्षण की व्यवस्था मुझे ही करनी थी क्योंकि मैं शिक्षिका थी अत: यह मेरे लिए प्रसन्नता ...]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://magnificentnews.co.in/wp-content/uploads/2012/02/drug.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-12" title="drug" src="http://magnificentnews.co.in/wp-content/uploads/2012/02/drug.jpg" alt="" width="136" height="160" /></a></p>
<p>बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक रचिता दी एकदम से सामने आ खड़ी हुई, प्रार्थना इनसे मिलो ये भाभी हैं और ये हैं प्रताप भैया । बचपन से नाम सुनती आई थी, बातें कम ही की थीं, क्योंकि अपने बाल्यकाल से ही अल्पभाषी थी ही, दूसरे गांव में मेरा रहना ही कम हुआ था , फिर भी परिचित लोगों को देखकर मैंने शिष्टाचारवश करबद्ध प्रणाम किया तो पति- पत्नी ने आशीर्वादों की जैसे झडी लगा दी । मन सुवचनों को सुनकर तृप्त हो गया तो मैं अतिथ्य सत्कार में जुट गई।<br />
आगन्तुक सम्पन्न घराने से संबद्ध थे सो चाय से लेकर भोजन तक उनके ठसक में कमी न आने दी ! एक विशेष बात यह थी कि उनके साथ उनका प्यारा सुपुत्र त्रिलोकी भी था जिसे मुझसे विशेष रुप से मिलाया गया था क्योंकि उसके शिक्षण की व्यवस्था मुझे ही करनी थी क्योंकि मैं शिक्षिका थी अत: यह मेरे लिए प्रसन्नता की बात थी । किसी शिक्षिका अथवा शिक्षक से जाकर विद्यार्थी, विद्यालय या फिर विद्या की बात करें तो उसे स्वर्ग से सुख का अनुभव होता है और मेरे लिए भी यह बड़े गर्व की बात थी फिर शिक्षक वर्ग से मेरा बड़ा विशिष्ट स्थान था सो थोड़े से प्रयास करने भर से ही मध्यावधि में भी शहर के सबसे नामी संस्थान में त्रिलोकी की वोर्डिग शिक्षा प्रारम्भ हो गई । मैं निश्चित हो गई कि चलो अब बच्चा ढंग से पढ़ेगा और बढ़ेगा ।<br />
किसी ने सच ही कहा है कि जीवन में हमेशा ही कुछ नया देखने को मिलता है। अब कहानी को आगे बढाती हूं –<br />
त्रिलोकी बहुत ही कमजोर शिक्षार्थी था, किन्तु इसमें उसका कोई दोष नहीं था क्योंकि उसे पढने ही नहीं दिया गया था, संबंधित सभी शिक्षकों से उसके पाठ्यक्रम की सुव्यवस्था करा मैं उसपर शिक्षकों से विशेष ध्यान देने का आग्रह कर घर लौटी तो देखा भैया—भाभी पधारे हुए हैं । झुंझलाते हुए मैं उनसे मिली और फिर सेवादारी में लग गई । कुल दस दिनों तक वे लोग रुके । इधर आते- जाते मैं देख रही थी कि मेरे घर के आस-पास रुई, बैन्डेज, निडिल्स इत्यादि देखती और सोचती थी कि मुहल्ले में कौन बिमार है जिसकी खबर मुझे नहीं है । मुझे तो चलती-फिरती न्यूज रिर्पोटर की तरह सब लोग पहचानते थे और मेरा स्वभाव भी कुछ ऐसा था कि जहां कहीं भी किसी के दुखी या बिमार होने की सुचना मिली नहीं कि मैं दौड़कर पहुंचती, मेरे इसी स्वभाव ने मैं जहा भी रही सबको एक सुत्र में बांधे रखा । किन्तु इस रहस्य को समझने को मौका ही नहीं मिल रहा था – कि एक शाम भाभी ने मुझे अपना दुखड़ा सुनाना प्रारम्भ किया कि उनके कुल्हे के घाव में इन्फेक्शन है और वहां के मांस के सड़ने से चौबीस घंटे उसकी मरहम पट्टी&#8211; करनी पड़ती है सो सुई- दवा में ही सारे पैसे खर्च हो जाते हैं और मैं बहुत बीमार भी रहती हुं सो आपको ही मेरे बच्चे की पुरी जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी कहते हुए मेरे चरण की तरफ झुकी तो मेरी आखे भर आई और मैंने कहा, उपकार कैसा यह तो मेरा फर्ज है । मैं खाना बनाते हुए उनकी तरह-तरह की बातें सुनती रहीं वे कभी भूत-प्रेत कभी किसी टोटके तो कभी सौत के द्वारा भेजी गई बिमारी की बातें बतातीं सुनते- सुनते मेरे अबोध मन ने घबड़ा कर सब कुछ स्वीकार कर लिया किन्तु मेरी उच्च शिक्षा ने बहुत सारे आडम्बरों को तुरन्त कुछ- कुछ छांट कर अलग भी कर दिया फिर भी मैंने तय किया कि इन दम्पत्तियों को मेरा सहयोग तो मिलना ही चाहिए । शाम होते- होते उन्होंने एक दुकान में दर्द की दवा लेनी चाही तो दुकानदार के इन्कार करने पर मैंने अपने रौब के प्रभाव में वह दवा दिला दी । दुकानदार ने दवा देकर अर्थपूर्ण मुस्कन से मुझे देखा । दूसरे दिन पुन: उसी सुई की बात कहने पर मुझे थोड़ी घबराहट हुई और मैंने उस दुकानदार के यहां जाना उचित नहीं समझा, किन्तु यह क्या दूसरे दुकानदार ने तो स्पष्ट कहा मैं इस दवा को तभी दूगा जब डाक्टर ने लिखा होगा, तो मैं एकदम से सकपका गई और फिर एक परिचित दुकानदार की ओर शंकित मन से गई, ईधर दुकानदार भैया-भाभी की बातें सुन रहा था कि वो मुझे हाथ जोड़ रहे थे कि यह दवा नहीं मिलीं तो आज वो नहीं बचेंगी । मेरे निवेदन पर दुकानदार ने प्रचुर मात्रा में सुईया दे तो दी किन्तु हाथ जोड़कर कहा- मैडम घर पर आपसे आवश्यक बातें करनी है दो क्षण के लिए भी अवश्य पधारियेगा ।<br />
दिन भर क्लास में यह सोचती रही कि उसने इतना आवश्यक कह मुझे घर क्यू &#8212;&#8212;&#8211; बुलाया ? क्या कोई छुत की बिमारी है जो मुझे घर बुलाकर समझाना चाह रहा है जो हो मौका मिलते ही मैं उसके घर पर पहूंची । एक तो उसका घर मेरे विद्यालय के पास ही था दूसरे मैं , अपनी उत्सुकता दबा नहीं पा रही थी- जैसे ही दरवाजे पर पहुंची सपरिवार मेरे सम्मान में खड़े हो गये-आइये – आइये मैडम बैठिए । पत्नी को चाय बनाने के लिए कहने लगे तो मैं लगभग झुंझला कर बोली चाय-वाय छोड़िए और मुझे ये बताइये मनोज भाई आपने मुझे घर क्यू बुलाया है और आप क्या कहना चाह रहे हैं । सोचनीय मुद्रा में मनोज भाई बोले, आप जिनके लिए दवा खरीद रही थीं वो आपकी कौन है ? मेरे विस्तार से बताने पर वो बोले, मैडम वो सारी दवा नशे की थी, अब कभी भी कृपया आप स्वयं वह नहीं खरीदिएगा नशे की दवा नसेड़ी लेते हैं आपका तो बड़ा सम्मान है शहर में आपको ऐसा करना शोभा नहीं देता । मैंने लगभग रुआंसे स्वर में हां कहा इन बातों में अपनी अनभिज्ञाता बताई और घर की ओर चल पड़ी । मेरे तो होश उड़ गए, अपने आपको सम्भालना मुश्किल हो रहा था , विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस वस्तु की कहानियां हम किताबों में, अखबारों में या टी0वी0 पर देखते हैं वो मेरे इतने करीब से गुजरेगी । मैंने दिल ही दिल में मनोज भाई को सच्चाई से अवगत कराने के लिए धन्यवाद दिया। जब मैं घर पहुंची तो मेरी बहने खुब प्रसन्न थीं और हंसी मजाक कर रही थी और भाई साहब वही जहरीला नशा भाभी जी को देने की तैयारी कर रहे थे, जब उन्हें इंजेक्शन पड़ा तो वह दर्द से छटपटाने लगी उफ … उस कराह, उस दर्द की पीड़ा का वर्णन शब्दों में वर्णन करना तो मुश्किल है मेरे लिए । भाभी को रोता देख सभी ईश्वर से उस घाव के जल्दी ठीक होने की प्रार्थना कर रहे थे, और मैं एक ऐसे आग में जल रही थी जिससे न धुंआ निकल रहा न लपटें और ना ही अंगारे की तपिश, फिर भी मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इस दवा की सलाह दूं या दुआ करु यह तो जीते जी मौत का जश्न था ।<br />
कुछ देर बाद भाभी के भी जोर-जोर से हंसने की आवाज आई तो मैं चकित हुई । चाय लेकर पहूंची तो देखा सोलहों श्रृंगार में भाभी का रुप ही निखरा हुआ था । लाल हरे सूट और मैच करती चुड़ी और बिंदी में इतनी भली लग रही थी कि कुछ देर को सारी बातें झुठ सी लगने लगी । चाय पीते हुए भाभी ने मुझे गले से लगाकर ढेर सारा आशिर्वाद देकर घाव के जल्दी ठीक होने में दवा दिला कर एहसान की बात कहीं और स्वय ही अपना घाव दिखाने लगी । सभी सहानुभूति से भर उठे किन्तु मेरा मन वितृष्णा से सबकुछ समझने के प्रयास में रत हो गया – यह क्या ? यह घाव तो बिल्कुल मनोज भाई के बताये जैसा है, देखिएगा, मैडम बिल्कुल सड़े हुए बैगन के जैसा वहां का मांस सड़कर काला हो गया होगा, क्रमश: उसे काट कर निकालने से गड्ढा हो जायेगा किन्तु वहां प्रतिदिन इंजेक्शन देने से वहां का मांस उगेगा ही नहीं और विकृति ऐसी भयंकर होगी कि &#8212;&#8211;<br />
रात को फिर खाने के बाद जब मैंने उनलोगों की तैयारी देखी तो बिना किसी की परवाह किये बिना मैंने तीखे स्वर में घाव को डाक्टर से दिखाने की सलाह दी और कहा क्या बेवकुफी है आपलोगों की स्वयं से ही घाव का ईलाज कर रहे है । एक सांस में इतनी बात कह मैं चुप हो गई क्योंकि वो लोग सकपका गये थे और मैं उनसे मैं बहुत छोटी थी ।<br />
शनै-शनै समय बीतता गया करीब दो महीने के बात जब मैं उनसे मिली तब घाव, मवाद और भाभी के रुप को देखकर डर सी गई, हडिड्यों खंडहर …सहज ही ‘प्रेमचन्द’ की ‘भगजोगनी’ याद आ गई जिसके लिए प्रेमचन्द ने लिखा था कि ‘हडिड्यों’ का खंडहर में सौन्दर्य की देवी भला कब तक रह सकती थी’’ । दिन, सप्ताह और महीने बीतते रहे, एक बर्ष के पcश्चात घाव से निरन्तर खुन और मवाद बहुत ज्यादे मात्रा में गिरने लगा था, जिसे छुपाने के लिए भाभी बार-बार एक नकली हसी के साथ कपड़े बदलती रहती थी, और एक बात अब वह सुई सुबह शाम से बढकर दो-दो घंटे में पड़ने लगा था, शरीर बहुत कमजोर हो गया था,। अब तो उठने बैठने में भी तकलीफ होने लगी थी । ऐसा लगता था जैसे श्मशान से उठकर कोई प्रेतनी ही खड़ी हो गई है, जहां जाती वहीं चर्चा का विषय बन जाती थी क्योंकि वे जहा बैठती थी बहां हजारों मक्खियां भनभनाती रहती थी क्या कहुं उस परस्थितियों में ऐसा लगता जैसे सड़ा हुआ कुत्ता सबके बीच आ गया हो, लोगों के भद्दे इशारों को भी वे बड़ी सहजता से लेती थोड़ी देर झेपने के बाद ही वह हंसने लगती और पुन: उनकी दिनचर्या प्रारम्भ हो जाती ।<br />
धीरे –धीरे यह राज बिल्कुल खुल कर सबके सामने आ चुका था और सभी दबी जुबान से इस कहानी को एक दुसरे से कहते थे कि फंला की ……।<br />
कहानी आगे बढाते हुए मैं अब थोड़ा पति देव की चर्चा करना चाहती हूं । गोरा रंग, अच्छी कद काठी, पढा लिखा सभ्य व्यक्ति । बातें करते तो ऐसा लगता जैसे इससे स्वस्थ्य मस्तिष्क किसी इन्सान का हो ही नहीं सकता । एक विशेषता और थी इनमें जब ये अपने सुलझे हुए दिमाग से किसी संत सधु, गुणवान, धनवान अथवा भिखारी बातें करते तो वे इन्हीं के होकर रह जाते थे । उसपर खानदान का नाम सुनने के बाद तो जैसे इन्हें देव मानने में कोई शंका ही नहीं रह जाती । पत्नी को परमेश्वरी मानते देख एवं उनकी सेवा करते देख पहले तो विश्वास ही नहीं होता की इस युग में ऐसा भी कोई इन्सान पैदा हो सकता है । भाभी की नजरें उठने और झुकने भर की देर होती, पति उस इशारे को समझ सर्वशक्ति से उसे पुरा करने में जुट जाते । घाव की घुलाई, बैन्डेज करना, सामान लाना, खाना बनाना इत्यादि सारा काम वे चेहरे पर शिकन लाये बिना करते । भाभी का नाम जुबान पर यूं होता जैसे जरखरीद गुलाम भी ऐसे नाम न रटता हो ।<br />
भैया की गुलामी और तीमारदारी देखकर भाभी के औरत होने पर सभी कड़वाहट से भरकर उन्हें कलंकिनी ही कहते , किन्तु मुझे सारा नाटक समझने में दो या तीन महीने लगे मैं बिल्कुल समझ चुकी थी कि प्रभु ने यह अनोखा रंग मुझे भाभी को बचाने के लिए ही दिखाया था । फिर भी सब समझकर मेरे पैरों तलेकी जमीन खिसकने लगी थी—हे ईश्वर ये सब क्या है । थक कर मैंने भाभी से स्पष्ट बात करना उचित समझा और छुटिट्यों में उनके घर गई ।<br />
मैं&#8211; भाभी आप जो इन्जेक्शन लेती हैं वो किसकी सलाह है ।<br />
भाभी&#8212; डाक्टर की ।<br />
मैं &#8212;&#8212; तो आप इसे कम्पाउण्डर से क्यों नहीं दिखाती ।<br />
भाभी&#8212; चुप ।<br />
मैं&#8212;&#8212;&#8211; आपको हुआ क्या हैं ?<br />
भाभी&#8212;- कैन्सर ।<br />
मैं&#8212;- किसने कहा ?<br />
भाभी&#8212; दिल्ली और मुम्बई के डाक्टर ने ।<br />
मैं&#8212;&#8211; तो आप यहां क्या कर रही है, एडमिट होकर ठीक से इलाज क्यूं नहीं कर रही है ?<br />
भाभी&#8212; अब इसका कोई ईलाज नहीं है ? डाक्टर ने कहा है आप कुछ ही दीनों की मेहमान हैं । सो मैं चाहती हूं यहीं सबकुछ व्यवस्थित करुं । कुछ देर रुककर … बेटे को आपको सौंप दूं और सभी अपनों के बीच …<br />
मैं&#8212; झुठ । इतना कह मैं चुप हो जाती कि तभी मेरा मोवाईल बज उठा । ‘’त्रिलोकी के क्लास टीचर ने मुझे फोन पर बताया कि जिस भतीजे को लेकर आप परेशान हैं उसे हम अच्छी शिक्षा कैसे दे सकते हैं वो तो रात्रि में नशे की गोलिया खाता है। हास्टल वार्डन ने बताया है । मेरे तो सब्र का सारा बांध टुट गया, हे भगवान बारह साल का बच्चा और नशे की गोली । ‘’ मैं तो जैसे फुट ही पड़ी भाभी जी क्युं कर रही हैं , आप ऐसा ? आप ड्रग्स लेती है , बेटे को नशे की दवा देती हैं ? क्यू मरना चाहती हैं आप ? भरा –पुरा परिवार है, पति है, बच्चा है, धन है, समाज है फिर क्या है इस व्यावहार का मतलब । मैं बिना रोके बोलती गई । आपको मालूम है कि आपके पति आपको मारना चाहते है ? आपको नहीं लगता कि कैसे आपको मना-मना कर वो इन्जेक्शन देते और आपको मौत के मुंह में ढकेल रहे हैं और अब इकलौती सन्तान भी ।<br />
भाभी—मौन<br />
मैं &#8212; हाथ जोड़ते हुए मैने कहा भाभी अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है । आप किसी को कुछ बताये बिना मेरे साथ चलिए । मुझे किसी ने बताया है कि दिल्ली में युनानी पद्धति से बहुत कारगर ईलाज होता है मैं तन-मन धन से आपकी सेवा करुंगी और आपका ईलाज बिल्कुल संभव है । हां, जब तक ईलाज प्रारम्भ नहीं होता तबतक आप इन्जेक्शन न लेकर गोली ले सकती हैं । मुझे यह जानकारी उसी दुकानदार ने दी है। इससे घाव के भरने में मदद मिलेगी और आपको कष्ट भी कम होगा । अब भैया की बात आप एकदम नहीं मानेंगी मैं कह देती हूं । अब आपको सब कुछ समझदारी से करना है कह देती हूं ।<br />
सब कुछ एक सांस में कहने के बाद ऐसा लगा मेरे हृदय का सारा बोझ उतर गया हो। मुझे लगा तीर निशाने पर लगा है ।<br />
भाभी&#8212;&#8211; ठीक है, मैं जल्दी ही तैयारी कर आपको बुलाती हूं ।<br />
मैं&#8212;- खुशी-खुशी हल्के मन से मैं घर वापस आ गई । किन्तु यह क्या ? मेरी सारे बातें हवा में उड़ा कर भाभी तो …… मैंने फिर भी हिम्मत नहीं हारी, जब वो मेरे घर आई तो उन्हें चाय पकड़ाते हुए मैंने बड़ी बेशर्मी से उनसे कहां भाभी, मैंने सुना है कि आपके पति का विवाह के पूर्व किसी मुस्लिम महिला से संबंध था जो अब पेशेवर भी है ।<br />
भाभी &#8212; हां, किन्तु आजकर वो वहां नहीं जाते ।<br />
मैं&#8212; कबतक नहीं जायेंगे वो जब तक आप जीवित है । मैंने बिना समय गंवाये कहा, आप समझती क्युं नहीं कि जब तक यह शरीर है तभी तक संसार है । सोचिए आपके बाद आपके बेटे का क्या होगा ? पति देव तो उस महिला के पास चले जायेंगे, अब वो कोई भद्र महिला तो है नहीं, उसे आपके पुत्र से क्या लेना-देना फिर आपकी विधवा मां का क्या होगा जिनकी आप इकलौती औलाद है । भाभी-मेरा इसमें कोई स्वार्थ नहीं है किन्तु मैं चाहती हूं कि आपका पुरा परिवार स्वस्थ हो । आप जान बुझकर अपने हत्यारे पति के गलत और गन्दे इरादे को संबल देकर बढावा दे रही है ।<br />
भाभी&#8212; आप भी तो जितनी पढी लिखी हैं तो आपको भारत की प्रधानमंत्री होना चाहिए था , किन्तु आप क्या हैं ? एक मामुली शिक्षिका । छोड़ दिजिए मुझे मेरे हाल पर ।<br />
मैं&#8212; हां, हुं मैं मामुली शिक्षिका शायद इसलिए कि आप जैसे भटके हुए नेशेड़ियों को नशा मुक्त कर सकूं और उन्हें अपने नजदीक बिठाकर समझा सकूं अब आप जैसे लोग नहीं समझते तो मुझे भी अपने मामूली शिक्षिका होने पर थोड़ा अफसोस जरुर होता है । किन्तु आप जैसी सुघर महिला और आपके प्यारे से सुपुत्र को यदि मैं ड्रग्स से बचा सकी तो मेरा शिक्षिका होना भी सार्थक हो जायेगा । लेकिन ……… मैं कुछ कहती तभी उनके घर के भीतर से एक चीख सुनाई दी तो हम दोनों ही भाग कर घर, अन्दर गये देखा उनके पति देव और मेरे भई-साहब अपने पुत्र को बड़ी बेदर्दी से सुई दे रहे थे और उनका बेटा नहीं –नहीं बोल रहा था । भाभी और मैं स्तब्ध एक दूसरे को देखते रह गये । मेरी बोलने की शक्ति समाप्त हो गई थी , मैंने बच्चे को प्यार से सहलाया और लड़खराते कदमों से घर की ओर चल पड़ी । ईश्वर से उन्हे सुबुद्धि देने की प्रार्थना करते-करते कब आंख लग गई मुझे पता नहीं चला । कानों में सबके हंस-हंस के बाते करने की आवाज से आंख खुली तो पता चला इस सम्मेलन की मुखियां भाभी ही हैं जानकर दिल और दिमाग में दर्द सा होने लगा । सभी चाय पी रहे थे तो भाभी ने मेरे बारे में पुछा तो मां ने कहा, पता नहीं कहीं से आई और चुप-चाप सो गई है । थोड़ी देर बाद भाभी मेरी चाय की प्याली लेकर आई और मेरे पास बैठते हुए धीरे से बोली, आप चिन्ता न करें प्रार्थना मैंने आपकी बात मानने की ठान ली है । मैंने आपको आहत किया । कृपया क्षमा करें । मैंने जब उनकी आखों में देखा तो उसमें एक गजब की चमक दिखाई दी, जो आत्म विश्वास से भरी हुई थी, मैं प्यार से लिपट गई थी भाभी ने गले से लगाकर कहां प्रार्थना मुझे और मेरे परिवार को आपकी बड़ी जरुरत है। अभी इलाज भी करना है और त्रिलोकी को कुछ बनाना भी है और सबसे बड़ी बात तो यह है कि मुझे आपके भैया की सोंच और समझ का नजरिया भी बदलना है । मैंने भाभी को धन्यवाद कहा तथा अपनी जीत और नशे की हाल पर खुश होकर हंस पड़ी ।</p>
<p><strong>सविता सिंह नेपाली</strong></p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://magnificentnews.co.in/?feed=rss2&#038;p=1</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
	</channel>
</rss>

